पवनपुत्र हनुमान का निवास स्थान कलयुग में इस पर्वत पर है
कलयुग में पवनपुत्र हनुमानजी महाराज का निवास स्थान गंधमादन पर्वत!!!!!!
* रामु अमित गुन सागर थाह कि पावइ कोइ।
संतन्ह सन जस किछु सुनेउँ तुम्हहि सुनायउँ सोइ॥
भावार्थ:-श्री रामजी अपार गुणों के समुद्र हैं, क्या उनकी कोई थाह पा सकता है? संतों से मैंने जैसा कुछ सुना था, वही आपको सुनाया॥
धर्म प्रसार के लिए अमर हैं हनुमान,,,,,प्रभु श्रीराम के भक्त हनुमान को अमर माना जाता है। पुराणों के अनुसार श्रीराम एवं सीता माता ने बजरंगबली को कलयुग में अधर्म के नाश और धर्म के प्रसार के लिए अमरत्व का वरदान दिया था। इसी कारण धरती पर कुछ प्रमुख स्थानों को हनुमान का निवास स्थान माना जाता है। इन्हीं विशेष जगहों में से गंधमादन पर्वत एक है।
कैलाश के उत्तर दिशा में है स्थित,,,,गंधमादन एक छोटा-सा पर्वत है, जो हिमालय के कैलाश पर्वत के उत्तर दिशा में स्थित है। वर्तमान में ये तिब्बत के क्षेत्र में आता है। यहां जाने के तीन रास्ते हैं। पहला मार्ग नेपाल होते हुए मानसरोवर के आगे, दूसरा विकल्प भूटान के पहाड़ी इलाके से और तीसरा रास्ता अरुणाचल से चीन होते हुए है।
पुराणों से होती है पुष्टि,,,,,गंधमादन पर्वत बजरंगबली का निवास स्थान है, इस बात की पुष्टि कई पुराणों एवं हिंदू धर्म ग्रंथों में हुई है। श्रीमद् भागवत गीता में इस पर्वत के बारे में प्रमुखता से उल्लेख किया गया है। एक अन्य ग्रंथ महाभारत में भी इस पर्वत का विवरण है। इसमें पांडव और हनुमान के भेंट के बारे में बताया गया है।
गंधमादन में रहने का कारण,,,,हनुमान जी ने पूरी धरती में गंधमादन को ही अपना निवास स्थान क्यों बनाया, इस बात का उत्तर श्रीमद् भगावत् पुराण में मिलता है। इस धर्म ग्रंथ के अनुसार जब प्रभु श्रीराम धरती से बैकुंठ को प्रस्थान कर रहे थे, तभी उन्होंने हनुमान को धरती पर रहने का आदेश दिया। प्रभु की इच्छानुसार बजरंगबली ने ईश्वरीय शक्ति से युक्त गंधमादन को अपना निवास स्थल चुना।
हनुमान को नहीं हटा पाए थे भीम,,,,,अपने अज्ञातवास के दौरान पांडव हिमवंत पार करके गंधमादन पर्वत के पास पहंुचे थे। भीम सहस्त्रदल कमल लेने के लिए इस पर्वत आए थे। वहां उन्होंने हनुमान को लेटा देखा। भीम ने बजरंगबली को हटने को कहा, हनुमान नहीं हटे। उन्होंने भीम से उनका पैर हटाकर जाने को कहा। शक्तिशाली होने के बावजूद भीम हनुमान को नहीं हटा सके, इस प्रकार उनका घमंड भी चूर-चूर हो गया।
महर्षि कश्यप ने भी की थी तपस्या,,,गंधमादन पर्वत अपने आप में बहुत खास है। पहले ये कुबेर के राज्य क्षेत्र मे था। यहां हनुमान से पहले भी कई महानुभाव रह चुके हैं। यहां महर्षि कश्यप ने तप किया था। इसके अतिरिक्त कई अन्य ऋषि-मुनियों, अपसराओं व किन्नरों ने भी इस पर्वत को अपना निवास स्थान बनाया था।
जड़ी-बूटियों की सुगंध से पड़ा नाम,,,,गंधमादन पर्वत के नामकरण की कथा भी रोचक है। ग्रंथों के वर्णन के अनुसार इस पर्वत पर कई जड़ी-बूटियों के वृक्ष है। पूरा वन इनसे सुगंधित होता है। इसी कारण पर्वत का नाम गंधमादन पड़ा। सुमेरू पर्वत की चारों दिशाओं में इन्हें गजदंत पर्वत के नाम से भी जाना जाता था।
रामेश्वर में भी है गंधमादन,,,कैलाश के उत्तर दिशा के अलावा रामेश्वर में भी एक गंधमादन पर्वत है। इस स्थान से हनुमान जी ने समुद्र पार कर लंका पहुंचने के लिए छलांग लगाई थी।
गंधमादन पर्वत का उल्लेख कई पौराणिक हिन्दू धर्मग्रंथों में हुआ है। महाभारत की पुरा-कथाओं में भी गंधमादन पर्वत का वर्णन प्रमुखता से आता है। हिन्दू मान्यताओं के अनुसार माना जाता है कि यहाँ देवता रमण करते हैं।
पर्वतों में श्रेष्ठ इस पर्वत पर कश्यप ऋषि ने भी तपस्या की थी। गंधमादन पर्वत के शिखर पर किसी भी वाहन से नहीं पहुँचा जा सकता। यहाँ पापात्मा नहीं पहुँच पाते। पापियों को विषैले सरीसृप, कीड़े-मकौड़े डस लेते हैं।
अपने अज्ञातवास के समय हिमवंत पार करके पाण्डव गंधमादन के पास पहुँचे थे।
कुबेर के राजप्रासाद में गंधमादन की उपस्थिति देखी जाती है। इंद्र लोक में जाते समय अर्जुन को हिमवंत और गंधमादन को पार करते दिखाया गया है। गंधमादन में ऋषि, सिद्ध, चारण, विद्याधर, देवता, गन्धर्व, अप्सराएँ और किन्नर निवास करते हैं। वे सब यहाँ निर्भीक विचरण करते हैं।
इसी पर्वत पर भीमसेन और श्रीराम के भक्त हनुमान का मिलन हुआ था। भीमसेन ने यहाँ क्रोधवश्वत को पराजित किया था। हिमवत पर गंधमादन के पास वृषपर्वन का आश्रम स्थित था।
यहाँ नित्य सिद्ध, चारण, विद्याधर, किन्नर आदि परिभ्रमण करते दृष्टिगोचर होते हैं। मार्कण्डेय ऋषि ने नारायण के उदर में गंधमादन के दर्शन किए थे। स्वर्ण नगरी लंका को खो देने पर कुबेर ने गंधमादन पर ही निवास किया था।
गंधमादन शिखर पर गुह्यों के स्वामी, कुबेर, राक्षस और अप्सराएँ आनन्द पूर्वक रहते हैं। गंधमादन के पास कई छोटी स्वर्ण, मणि, मोतियों सी चमकती पर्वत मालाएँ हैं। माना जाता है कि इस पर्वत पर मानव जीवन की अवधि 11,000 वर्ष है।
यहाँ आदमी सर्वानंद प्राप्त करता है, स्त्रियाँ कमलवत् लावण्यमयी हैं। गंधमादन पर देवता और ऋषिगण आदि पितामह ब्रह्मा की साधना में साधनारत रहते हैं। यह देव पर्वत शिखर अमृत और अक्षय आनन्द अनुभूति का महास्त्रोत है।


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