हजारों साल पहले ऋषियों के आविष्कार


*हजारों साल पहले ऋषियों के आविष्कार?*

सनातन धर्म वेद पुराणों को मानता है। प्राचीन ऋषि-मुनियों ने घोर तप, कर्म, उपासना, संयम के जरिए वेद में छिपे इस गूढ़ ज्ञान व विज्ञान को ही जानकर हजारों साल पहले ही कुदरत से जुड़े कई रहस्य उजागर करने के साथ कई आविष्कार किए व युक्तियां बताईं। ऐसे विलक्षण ज्ञान के आगे आधुनिक विज्ञान भी नतमस्तक होता है।

आज के परिवेश के जन सामान्य में हमारे प्राचीन ऋषियों-मुनियों के बारे में ऐसी धारणा जड़ जमाकर बैठी हुई है कि वे जंगलों में रहते थे, जटाजूटधारी थे, भगवा वस्त्र पहनते थे, झोपड़ियों में रहते हुये दिन-रात ब्रह्म-चिन्तन में निमग्न रहते थे।

सांसारिकता से उन्हें कुछ भी लेना-देना नहीं रहता था, इसी पंगु अवधारणा का एक बहुत बड़ा अनर्थकारी पहलू यह हैकि हम अपने महान पूर्वजों के जीवन के उस पक्ष को एकदम भुला बैठे, जो उनके महान् वैज्ञानिक होने को न केवल उजागर करता है वरन् सप्रमाण पुष्ट भी करता है।

*महर्षि भरद्वाज ऋषि हमारे उन प्राचीन विज्ञानवेत्ताओं में से ही एक ऐसे महान् वैज्ञानिक थे, जिनका जीवन तो अति साधारण था लेकिन उनके पास लोकोपकारक विज्ञान की महान दृष्टि थी, महर्षि भारद्वाज मुनि‍‍ और कोई नही बल्कि वही ऋषि है, जिन्हें त्रेता युग में  भगवान् श्रीरामजी से मिलने का सोभाग्य दो बार प्राप्त हुआ, एक बार श्रीरामजी के  वनवास काल में, तथा दूसरी बार लंका से लौट कर अयोध्या जाते समय*

इसका वर्णन वाल्मिकी रामायण तथा तुलसीदास कृत रामचरितमानस में मिलता है, महाभारत काल तथा उससे पूर्व भारतवर्ष में भी विमान विद्या का विकास हुआ था, न केवल विमान अपितु अंतरिक्ष में स्थित नगर रचना भी हुई थी, इसके अनेक संदर्भ प्राचीन वांग्मय में मिलते हैं, निश्चित रूप से उस समय ऐसी विद्या अस्तित्व में थी जिसके द्वारा भारहीनता 0 ग्रेवीटी की स्थति उत्पन्न की जा सकती थी, यदि पृथ्वी की गरूत्वाकर्षण शक्ति का उसी मात्रा में विपरीत दिशा में प्रयोग किया जाये तो भारहीनता उत्पन्न कर पाना संभव है।

विद्या वाचस्पति पं. मधुसूदन सरस्वतीजी ने ”इन्द्रविजय” नामक ग्रंथ में ऋग्वेद के छत्तीसवें सूक्त प्रथम मंत्र का अर्थ लिखते हुये कहते हैं कि ऋषियों ने तीन पहियों वाला ऐसा रथ बनाया था जो अंतरिक्ष में उड़ सकता था, पुराणों में विभिन्न देवी देवता, यक्ष, और स्वयं देवराज इंद्र और बहुत से देवी-देवता विमानों द्वारा यात्रा करते रहे हैं, इस प्रकार के उल्लेख हमारे ग्रन्थों में मिलते हैं।

त्रिपुरासुर याने तीन असुर भाइयों ने अंतरिक्ष में तीन अजेय नगरों का निर्माण किया था, जो पृथ्वी, जल, व आकाश में आ जा सकते थे और भगवान शिव ने जिन्हें नष्ट किया, वेदों मे विमान संबंधी उल्लेख अनेक स्थलों पर मिलते हैं, ऋषि और देवताओं द्वारा निर्मित तीन पहियों के ऐसे रथ का उल्लेख ऋग्वेद (मण्डल 4, सूत्र 25, 26) में मिलता है, जो अंतरिक्ष में भ्रमण करता है, ऋषिओं ने मनुष्य-योनि से देवभाव पाया था।

देवताओं के वैद्य अश्विनीकुमारों द्वारा निर्मित पक्षी की तरह उडऩे वाले त्रितल रथ, विद्युत-रथ और त्रिचक्र रथ का उल्लेख भी पाया जाता है, महाभारत में श्री कृष्ण, जरासंध आदि के विमानों का वर्णन आता है, वाल्मीकि रामायण में वर्णित ‘पुष्पक विमान’ (जो लंकापति रावण के पास था) के नाम से तो प्राय: सभी परिचित हैं, लेकिन इन सबको कपोल-कल्पित माना जाता रहा है,

लगभग छह दशक पूर्व सुविख्यात भारतीय वैज्ञानिक डॉक्टर वामनराव काटेकर ने अपने एक शोध-प्रबंध में पुष्पक विमान को अगस्त्य मुनि द्वारा निर्मित बतलाया था, जिसका आधार "अगस्त्य संहिता" की एक प्राचीन पाण्डुलिपि थी, अगस्त्य के "अग्नियान ग्रंथ"  के भी सन्दर्भ अन्यत्र भी मिले हैं, इनमें विमान में प्रयुक्त विद्युत्-ऊर्जा के लिए "मित्रावरुण तेज" का उल्लेख है, महर्षि भरद्वाज ऐसे पहले विमान-शास्त्री हैं, जिन्होंने अगस्त्य के समय के विद्युत् ज्ञान को अभिवर्द्धित किया।

निर्मथ्य तद्वेदाम्बुधिं भरद्वाजो महामुनिः।
नवनीतं समुद्घृत्य यन्त्रसर्वस्वरूपकम्‌।।
प्रायच्छत्‌ सर्वलोकानामीप्सिताज्ञर्थ लप्रदम्‌।
तस्मिन चत्वरिंशतिकाधिकारे सम्प्रदर्शितम्‌।।

नाविमानर्वैचित्र्‌यरचनाक्रमबोधकम्‌।
अष्टाध्यायैर्विभजितं शताधिकरणैर्युतम।।
सूत्रैः पञ्‌चशतैर्युक्तं व्योमयानप्रधानकम्‌।
वैमानिकाधिकरणमुक्तं भगवतास्वयम्‌।।

अर्थात, भरद्वाज महामुनि ने वेदरूपी समुद्र का मन्थन करके यन्त्र सर्वस्व नाम का ऐसा मक्खन निकाला है , जो मनुष्य मात्र के लिए इच्छित फल देने वाला है, उसके चालीसवें अधिकरण में वैमानिक प्रकरण जिसमें विमान विषयक रचना के क्रम कहे गयें हैं, यह ग्रंथ आठ अध्याय में विभाजित है तथा उसमें एक सौ अधिकरण तथा पाँच सौ सूत्र हैं, उसमें विमान का विषय ही प्रधान है, ग्रंथ के बारे में बताने के बाद बोधानन्द भरद्वाज मुनि के पूर्व हुए आचार्य व उनके ग्रंथों के बारे में लिखते हैं।

वे आचार्य तथा उनके ग्रंथ है- नारायण कृत- विमान चन्द्रिका, शौनक कृत न् व्योमयान तंत्र, गर्ग- यन्त्रकल्प, वायस्पतिकृत- यान बिन्दु + चाक्रायणीकृत खेटयान प्रदीपिका, एवम् धुण्डीनाथ- व्योमयानार्क प्रकाश, विमान की परिभाषा देते हुये अष् नारायण ऋषि कहते हैं- जो पृथ्वी, जल तथा आकाश में पक्षियों के समान वेग पूर्वक चल सके, उसका नाम विमान है, शौनक ऋषि अनुसार–एक स्थान से दूसरे स्थान को आकाश मार्ग से जा सके,

महर्षि भारद्वाज रचित विमान शास्त्र विश्वम्भर के अनुसार– एक देश से दूसरे देश या एक ग्रह से दूसरे ग्रह जा सके, उसे विमान कहते हैं, अन्तर्राष्ट्रीय संस्कृत शोध मण्डल ने प्राचीन पाण्डुलिपियों की खोज के विशेष प्रयास किये, फलस्वरूप् जो ग्रन्थ मिले, उनके आधार पर भरद्वाज ऋषि का विमान-प्रकरण, विमान शास्त्र प्रकाश में आया, इस ग्रन्थ का बारीकी से अध्यन करने पर आठ प्रकार के विमानों का पता चला!

शक्त्युद्गम- बिजली से चलने वाला, भूतवाह- अग्नि, जल और वायु से चलने वाला, धूमयान- गैस से चलने वाला और शिखोद्गम- तेल से चलने वाला, इसी प्रकार महर्षि भारद्वाज रचित विमान शास्त्र जो हैं- अंशुवाह- सूर्यरश्मियों से चलने वाला, तारामुख- चुम्बक से चलने वाला, मणिवाह- चन्द्रकान्त, सूर्यकान्त मणियों से चलने वाला, एवम् मरुत्सखा- केवल वायु से चलने वाला।

सर्वप्रथम इस विमान शास्त्र को मिथ्या माना  गया परन्तु अध्यन से चोंका देने वाले तथ्य सामने आये जैसे विमान का जो प्रारूप तथा जिन धातुओं से विमान का निर्माण इस विमान शास्त्र में उल्लेखित है वह परिकल्पना आधुनिक विमान निर्माण पद्धति से मेल  खाती है।

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