भगवान विष्णु के पांचवें अवतार हयग्रीव की कथा
मित्रो, आज हम आपको भगवानविष्णु के पांचवें अवतार हयग्रीव की कथा बतायेंगे!!!!!!!
एक समय की बात है। हयग्रीव नाम का एक परम पराक्रमी दैत्य हुआ। उसने सरस्वती नदी के तट पर जाकर माँ भगवती को प्रसन्न करने के लिए बड़ी कठोर तपस्या की।
वह बहुत दिनों तक बिना कुछ खाए भगवती के मायाबीज एकाक्षर महामंत्र का जाप करता रहा। उसकी सभी इंद्रियां उसके वश में हो चुकी थीं। सभी भोगों का उसने त्याग कर दिया था। उसकी कठिन तपस्या से प्रसन्न होकर माँ भगवती ने उसे तामसी शक्ति के रूप में दर्शन दिया। भगवती महामाया ने उससे कहा, हे वत्स तुम्हारी तपस्या सफल हुई।
मैं तुम पर अति प्रसन्न हूं। तुम्हारी जो भी इच्छा हो वर मांग लो, मैं उसे पूर्ण करने के लिए तैयार हूं। माँ के वचन सुनकर उसकी खुशी का ठिकाना नही रहा और वह बोला की हे माँ - आपको नमस्कार है। आप हो श्रृष्टि की पालक हो यदि आप मुझ पर प्रसन्न हो तो मुझे अमर होने का वरदान देने की कृपा करें। माता ने कहा, दैत्य राज! संसार में जिसका जन्म होता है, उसकी मृत्यु निश्चित है।
प्रकृति के इस विधान से कोई नहीं बच सकता। किसी का सदा के लिए अमर होना असंभव है। अत: तुम इस के अतिरिक्त कोई और वर मांगो।हयग्रीव बोला, अच्छा तो हयग्रीव के हाथों ही मेरी मृत्यु हो। दूसरा कोई मुझे न मार सकें।
मेरी ये इच्छा पूर्ण करने की कृपा करें। ऐसा ही हो। ये ।कहकर माता अंतर्ध्यान हो गयीं। अब हयग्रीव की खुशी का कोई ढिकाना नहीं रहा, क्योकि अब वह अजेय हो गया कोई भी उसकी मृत्यु नही कर सकता उसने ब्रह्मा जी से वेदों को छीन लिया और देवताओं तथा मुनियों को सताने लगा।
यज्ञादि कर्म बंद हो गए और सृष्टि की व्यवस्था बिगडऩे लगी। ब्रह्मादि देवता भगवान विष्णु के पास गए, किन्तु वे योगनिद्रा में मग्न थे सब ने उन्हें जगाने की बहुत कोशिश की परन्तु कुछ न हुआ, और उनके धनुष की प्रत्यंचा चढ़ी हुई थी ब्रह्मा जी ने उनको जगाने के लिए वम्री नामक एक कीड़ा उत्पन्न किया।
ब्रह्मा जी की प्रेरणा से उसने धनुष की प्रत्यंचा काट दी। उस समय बड़ा भयंकर शब्द हुआ और भगवान विष्णु का मस्तक कटकर अदृश्य हो गया। सिर रहित भगवान के धड़ को देखकर देवताओं के दुख की सीमा न रही। सभी लोगों ने इस विचित्र घटना को देखकर भगवती की स्तुति की। भगवती प्रकट हुई। उन्होंने कहा,देवता चिंता मत करो सब मंगल होगा।
ब्रह्माजीएक घोड़े का मस्तक काटकर भगवान के धड़ से जोड़ दें। इससे भगवान का हयग्रीवावतार होगा। वे उसी रूप में दुष्ट हयग्रीव दैत्य का वध करेंगे। भगवती के कथनानुसार उसी क्षण ब्रह्मा जी ने एक घोड़े का मस्तक उतारकर भगवान के धड़ से जोड़ दिया।
भगवती के कृपा प्रसाद से उसी क्षण भगवान विष्णु का हयग्रीवावतार हो गया। फिर भगवान का हयग्रीव दैत्य से भयानक युद्ध हुआ। अंत में भगवान के हाथों हयग्रीव की मृत्यु हुई। हयग्रीव को मारकर भगवान ने वेदों को ब्रह्मा जी को पुन: समर्पित कर दिया और देवताओं तथा मुनियों का संकट निवारण किया।

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