गोरखपुर: लिपिक दीपा की गिरफ्तारी के बाद सामने आया जीडीए में फैले भ्रष्टाचार का जाल


गोरखपुर। गोरखपुर की भ्रष्टाचार निवारण कमेटी द्वारा गोरखपुर विकास प्राधिकरण के दफ्तर के भीतर घूस लेते रंगे हाथों दीपा प्रियदर्शिनी को पकड़े जाने और शिकायतकर्ता शैलेश कुमार श्रीवास्तव की तरफ से इस 'खेल' में और अभियंताओं-कर्मचारियों की मिलीभगत का आरोप लगाने के बाद भी जीडीए के अफसर चुप हैं। उनकी यह चुप्पी कई तरह के सवाल खड़े कर रही है। शिकायतकर्ता ने उपाध्यक्ष ए. दिनेश कुमार को साक्ष्य के तौर पर कुछ ऑडियो सुनाए थे। उनमें दीपा के अलावा कुछ और अभियंताओं और बाबू की बातें रिकार्ड है। शैलेश का आरोप है कि जीडीए में कुछ अभियंताओं का पूरा रैकेट प्राधिकरण में सक्रिय है जो मानचित्र स्वीकृत कराने के नाम पर वसूली करता है।

दीपा तो इस रैकेट की एक छोटी-सी किरदार है। शैलेश का आरोप है कि उनसे दीपा के अलावा कुछ अभियंताओं ने भी घूस की मांग की थी। शैलेश ने शनिवार को भी उपाध्यक्ष से मिलकर और लोगों के खिलाफ जांच कराकर कार्रवाई करने की मांग की थी। उन्होंने तीन अभियंता, दो बाबू और एक असिस्टेंट का नाम भी लिया।

इसके बावजूद अभी तक इस सनसनीखेज मामले की जांच तो दूर सीसीटीवी कैमरों की रिकार्डिंग तक सुरक्षित करना मुनासिब नहीं समझा गया। इस मामले में जीडीए उपाध्यक्ष ए. दिनेश कुमार से संपर्क करने की कोशिश की गई, मगर बात नहीं हो पाई।
ऐसे चलता है अवैध वसूली का पूरा रैकेट गोरखपुर विकास प्राधिकरण (जीडीए) में भले ही मानचित्र के आवेदन एक साल से ऑनलाइन ही स्वीकार किए जाते हों, लेकिन वसूली का धंधा पहले की तरह ही ऑफलाइन फल-फूल रहा है। ऑनलाइन प्रक्रिया लागू होने के बाद से आवेदन सबसे पहले संबंधित अवर अभियंता (जेई) के पास पहुंचता है। कई मामलों में तो वहीं से सौदेबाजी शुरू हो जाती है। सौदा बना तो आवेदन में जो खामियां होती हैं, उन्हें दुरुस्त कराके या नजरअंदाज करके आगे बढ़ा दिया जाता है।

इसकी जानकारी भी संबंधित सहायक अभियंता (एई) को दी जाती है। जेई-एई से हरी झंडी मिलने के बाद ऊपर बैठे अफसर बहुत ज्यादा गौर नहीं करते और मानचित्र स्वीकृत हो जाता है। सभी अभियंता भले ही इस वसूली का हिस्सा न हों, मगर कई के नाम बदनाम हैं। आला अफसर भी दबी जुबां मानते हैं, मगर कार्रवाई के नाम पर उन्हें सांप सूंघ जाता है।
जानकारी के मुताबिक दो सौ वर्ग मीटर में निर्माण के मानचित्र को सचिव और उससे अधिक के निर्माण का मानचित्र उपाध्यक्ष स्वीकृत करते हैं। सभी तरह के व्यावसायिक मानचित्र भी उपाध्यक्ष ही स्वीकृत करते हैं। हालांकि फाइलें नीचे से ऊपर तक जाती हैं, इसलिए अधिशासी अभियंता व उससे ऊपर के अफसरों को 'खेल' की ज्यादा जानकारी नहीं हो पाती है।

हां, इतना जरूर पता रहता है कि नीचे के अफसरों ने कुछ 'खेल' जरूर किया है। तभी फाइल इतनी जल्दी पहुंची है। ऑफलाइन आवेदन की प्रक्रिया मानचित्र अनुभाग से शुरू होती थी, लिहाजा ज्यादातर आवेदक पहले वहीं पहुंचते हैं। वहां तैनात कुछ बाबू पहले सौदेबाजी करते हैं, फिर अपनी हिस्सेदारी की बात करके अवैध वसूली करते हैं।

आवेदन निरस्त करने में जीडीए सूबे में सबसे दागदार मानचित्र के आवेदन फार्म निरस्त होने और अवैध निर्माण के मामले में करीब छह महीने पहले तक जीडीए यूपी में पहले स्थान पर था। शासन स्तर पर हुई समीक्षा में पाया गया था कि जीडीए में मानचित्र के 60 फीसदी आवेदन निरस्त कर दिए जाते हैं।

इस मामले में प्रमुख सचिव आवास एवं शहरी नियोजन ने तीन सदस्यीय कमेटी को जांच भी सौंपी थी। कमेटी के सदस्यों ने दो दिन गोरखपुर में रहकर जीडीए के संबंधित दस्तावेज की पड़ताल की और फिर शासन को रिपोर्ट दी थी। इसके बाद मामला ठंडा पड़ गया।

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